Saturday, February 9, 2013

vo firag dil

दोस्तों मेरी खुली कविता आप के नाम

वो फिराग दिल,
इन्सान को हंसाने की सोचता,
उसे पथ भ्रष्ट होने से रोकता।
मगर इन्सान बाज नही आता,
पथ भ्रष्ट अक्सर  हो ही जाता।
सुख की खोज में पाता दुःख,
क्योकि रहता उससे विमुख,
जिसने बक्शा सबकुछ दिया,
उसके लिए हमने क्या किया।
किया  छल कपट धोखा बैर द्वेष,
फिर और क्या बचा है अब शेष।
हरगिज ऐसे सुख नही मिलता,
सूखे तालाब में कमल न खिलता।
इसे भक्ति रूपी जल भर झील बनाओ,
जब इस में श्रदा के कमल खिले अनेक,
"रैना"तब तुम्हे सुख मिलेगा प्रत्येक।"रैना"
सुप्रभात जी दोस्तों प्यार से बोलो ?????
भारत माता की जय।


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