Monday, September 2, 2013

मां के प्यारों के लिए

ठन्ठे झरने का जल होता
मां का प्यार निश्छल होता।
मां के प्यार के दरिया का,
कोई भी न साहिल होता।
मां की मुहब्बत का खजाना,
जाहिल को न हासिल होता।
खुदा ने बख्शी ये नयामत,
इन्सां कब इस काबिल होता।
सच्चा इश्क इबादत यारों, 
धोखा फरेब न शामिल होता।
करामात कुदरत की "रैना"
फूल सा मां का दिल होता। राजेन्द्र रैना गुमनाम"
सुप्रभात जी    ……जय जय मां

इक  और ग़ज़ल बहर 
2+1+2+2  2  2+1+2+2      
चेहरे पे मुस्कान रखते,
दर्द दिल में तूफान रखते।
छोड़ कर डर वो बेवजह का,
हम हथेली पे जान रखते।
यूं शहर में तो दबदबा है,
अलग अपनी पहचान रखते।
शान अपनी भी कम नही है,
दूसरों का भी मान रखते। 
बोलता कम ही ठग मसीहा, 
ध्यान सारा दरबान रखते।
मस्त तन मन मदहोश रैना",
छेड़ कर ऐसी तान रखते। राजेन्द्र रैना गुमनाम"
दोस्तों सुनो गे ग़ज़ल तो लो

इश्क में यूं पागल न होना,
तू लहर का साहिल न होना। 
जब उठे गा मेरा जनाजा,
तू गमी में शामिल न होना। 
लोग करते बेकार बातें,
तू कभी यूं जाहिल न होना।
तीर नजरों के तेज होते,
गौर करना घायल न होना।
बात उठती तो दूर जाती,
पार हद से कामिल न होना। 
आज "रैना" हैरान सा है,
अखरता है काबिल न होना।  राजेन्द्र रैना "गुमनाम"
                                                09416076914 
 कामिल =होशियार  

tu khushimn

दोस्तों सुनो गे ग़ज़ल तो लो 

इश्क में यूं पागल न होना,
तू लहर का साहिल न होना। 
जब उठे गा मेरा जनाजा,
तू गमी में शामिल न होना। 
लोग करते बेकार बातें,
तू कभी यूं जाहिल न होना।
तीर नजरों के तेज होते,
गौर करना घायल न होना।
बात उठती तो दूर जाती,
पार हद से कामिल न होना। 
आज "रैना" हैरान सा है,
अखरता है काबिल न होना।  
 कामिल =होशियार  


Sunday, September 1, 2013

हिम्मत ने फर्श से अर्श पर पहुंचाया,
वैसे मेरे  पैरों के नीचे जमीन नही थी। राजेन्द्र रैना गुमनाम 

hone lga mai bda

खुली कविता डर
आप की नज़र

पैदा होते ही होने था लगा डर का असर,
मरने तक डर ने छोड़ी न कोई भी कसर।

मां ने डराया बाप ने, दिन ने डराया रात ने,
सर्दी गर्मी डराती रही, खूब डराया बरसात ने।
मास्टर का डर रहा, झुका हमेशा सिर रहा,
खींच खींच डंडे पड़े, डर के मारे चुप रहे खड़े।
डर डर के हम पढ़े, देखते देखते हो गये बड़े।
मन की कली खिल गई,नौकरी जब मिल गई।
अधिकारी कड़क था,आफिस अपना नर्क था। 
हरपल रहता उसका डर,मिलती न उससे नजर,
बोस से जान छूट गई,शादी हुई किस्मत फूट गई।
ग्रहों का न मिला योग,बीवी बेलन करती प्रयोग।
रोज पड़ते धड़ा धड़,फिर बीवी से लगने लगा डर।
जैसे ही बच्चे हो गये बड़े,डंडे लेकर हुये खड़े।
हम छुपाते फिर नजर,डर से गंजा हो गया सर।
बुढ़ापा मजाक करने लगा, मौत से डरने लगा। 
डर ने मेरा खून निचौड़ा,इक पल पीछा न छोड़ा ।
हे भगवन ये क्या किया,डरने के लिए जीवन दिया। राजेन्द्र रैना गुमनाम

 



 

khel jiwan ko samjh ke

दोस्तों मेरी रचना गौर से पढ़ा करो
 मैं लिखता नही इबादत करता हूं

रास्ते में तो उदासी सी छाई है,
संभल कर चलने में भलाई है।
लुटेरों पे हत्या का शक लेकिन,
सच ये भाई का कातिल भाई है।
फसने के बाद नेता,बाबा कहते, 
ये तो किसी ने साजिश रचाई है।
नारी पे बुरी नजर डालने वाले ने,
अपनी लंका तो खुद ही जलाई है।
द्रोपदी की लाज कृष्ण बचा लेगा,
पर दुर्योधन की जान न बच पाई है।
उठो भारत देश के वीर नौजवानों,
देखो दुश्मन ने फिर आंख उठाई है।
मत खींचो महजब जात की लकीरें,
"रैना"हर हिन्दुस्तानी भाई भाई है।राजेन्द्र रैना "गुमनाम"